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मुंबई के मालाबार हिल का वालकेश्वर शिव मंदिर: जानिए रामायण काल से जुड़ी पौराणिक कहानी?

मुंबई मालाबार हिल में स्थित वालकेश्वर मंदिर जो शिव से जुड़ा प्राचीन मंदिर है, जिसका संबंध रामायण काल से जोड़ा जाता है. रेत से स्थापित शिवलिंग और लक्ष्मण द्वारा लाए गए शिवलिंग की आज भी पूजा होती है.

वालकेश्वर मंदिर रामायण कनेक्शन

दुनिया के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले महानगरों में से एक के ठीक बीचों-बीच में आपको कुछ अप्रत्याशित चीज देखने को मिल जाती है, जैसे मुंबई में एक प्राचीन शिव मंदिर, जिसके बारे में किंवदंती है कि यह मंदिर रामायण काल से जुड़ा है. इस मंदिर का नाम है वालकेश्वर मंदिर, जिसे बाण गंगा मंदिर के नाम से जाना जाता है. मुंबई के पॉश इलाके मालाबार हिल में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि, यह वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण के समय का है.

कहा जाता है कि, जब रावण ने सीता का अपहरण पंचवटी से किया और भगवान राम उनकी खोज में जुट गए, तो वे वर्तमान मुंबई पहुंचे. समुद्र तट पर तपस्या कर रहे ब्रह्मणों के एक समूह को भगवान राम के आने की सूचना मिली और वे उनके मार्गदर्शन के लिए वहां पहुंचे.

मुंबई नगर निगम के अंतर्गत मुंबई लेगेसी प्रोजेक्ट डी के मुताबिक, अपनी पत्नी सीता के अपहरण से राम की पीड़ा देखकर गौतम नामक एक ज्ञान ऋषि ने उन्हें अपने मिशन में सफलता प्राप्त करने के लिए शिवलिंग को स्थापित करने की सलाह दी.

गौतम ऋषि ने उन्हें पंचामृत पूजा करने लिए बनारस या काशी से सर्वश्रेष्ठ शिवलिंग लाने को कहा. उनकी सलाह को मानते हुए राम ने अपने भक्त भाई लक्ष्मण को गंगा नदी के पवित्र नगर बनारस से शिवलिंग लाने का कार्य सौंपा, जैसा कि मुंबई लेगेसी प्रोजेक्ट डी में बताया गया है.

हालांकि इस दौरान लक्ष्मण को बनारस की यात्रा में काफी समय लगा, और चूंकि यह जरूरी कार्य था, इसलिए भगवान राम ने वालकेश्वर के समुद्र तट पर रेत से एक शिवलिंग बनाया. उन्होंने शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर रस्म अदा की और पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद देने के लिए प्रकट हुए.

यह मूल योजना का हिस्सा नहीं था, लेकिन इस तात्कालिक रचना ने वालकेश्वर को उसका नाम दिया. वालुका का मतलब रेत और ईश्वर का अर्थ है भगवान. रेत से बने इस शिवलिंग को वालुकेश्वर के नाम से जाना जाने लगा, जिसका मतलब है कि, रेत से बना भगवान. मुंबई लेगेसी प्रोजेक्ट डी के मुताबिक, यह नाम बाद में विकसित होकर वालेश्वर बन गया.

जब लक्ष्मण बनारस से शिवलिंग लेकर लौटे, तो उसे रेत से बने शिवलिंग के बगल में स्थापित किया गया. आज मंदिर परिसर में लक्ष्मण द्वारा लाए गए शिवलिंग की ही पूजा की जाती है. वालकेश्वर को लक्ष्मणेश्वर के नाम से भी जाना जाता है.

दसवीं शताब्दी ईस्वी में शिलाहारा राजाओं द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था. मंदिर और मीठे पानी के बंगंगा तालाब का निर्माण 1128 ईस्वी में चंद्रसोनिया कायस्थ प्रभु के एक मंत्री लक्ष्मण प्रभु द्वारा कराया गया था. श्रावण माह के दौरान एक महीने तक चलने वाला उत्सव मनाया जाता है, जबकि महाशिवरात्रि पर एक मेला या जात्रा का भी आयोजन किया जाता है.

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