ज्यादा बैंक खाते होने से पैसे ट्रैक करना और बजट बनाना मुश्किल हो सकता है। अलग-अलग खातों से ऑटो पेमेंट, मिनिमम बैलेंस और चार्ज का बोझ बढ़ता है।
आजकल कई लोग अलग-अलग जरूरतों के लिए कई बैंक खाते खुलवा लेते। किसी खाते में सैलरी आती है, किसी में बचत रखते, किसी का इस्तेमाल खर्चों के लिए होता, तो कुछ लोग नौकरी बदलने या बैंक ऑफर के कारण भी नए खाते खोलते जाते। देखने में यह तरीका स्मार्ट लगता है, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा बैंक खाते आपकी पर्सनल फाइनेंस व्यवस्था को उलझा सकते।
जब पैसे कई खातों में बंटे होते हैं, तो कुल रकम का सही अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। हर खाते का बैलेंस अलग-अलग देखना पड़ता है, जिससे यह समझना कठिन होता है कि आपके पास कुल कितना कैश उपलब्ध है। ऐसे में सही बजट बनाना भी मुश्किल हो सकता।
हर खाते के साथ बढ़ता है झंझट
हर नया बैंक खाता मतलब नया पासवर्ड, अलग स्टेटमेंट, अलग नोटिफिकेशन और ट्रांजैक्शन हिस्ट्री। ज्यादा खाते होने पर इन्हें ट्रैक करना मुश्किल हो जाता। कई बार लोग फ्रॉड, फेल ट्रांजैक्शन, ऑटो डेबिट या निष्क्रिय खाते जैसी जरूरी चीजें मिस कर देते हैं।
छोटे-छोटे बैलेंस में फंस जाता है पैसा
कई खातों में थोड़ी-थोड़ी रकम पड़ी रहती है, जिससे पैसा सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पाता। यह रकम न तो निवेश में लगती है और न ही किसी बड़े काम आती है। ऐसे में कैश मैनेजमेंट कमजोर हो सकता।
आजकल ईएमआई, सिप, सब्सक्रिप्शन, बिजली-पानी के बिल और सैलरी जैसे कई पेमेंट ऑटो मोड में चलते। अगर खाते ज्यादा हों, तो किस पेमेंट के लिए कौन-सा खाता इस्तेमाल हो रहा है, यह संभालना मुश्किल हो जाता। इससे पेमेंट फेल होने या पेनल्टी लगने का खतरा बढ़ जाता है।
मानसिक असर भी पड़ता है
विशेषज्ञ बताते हैं कि लोग अलग-अलग खातों को अलग उद्देश्य से देखने लगते हैं। जैसे किसी खाते को सिर्फ सेविंग्स, किसी को खर्च वाला खाता मान लेते हैं। इससे कई बार फैसले भावनाओं पर आधारित होते हैं, न कि वास्तविक जरूरत पर। इसे “मेंटल अकाउंटिंग” कहा जाता है।
कई बैंक खातों में मिनिमम बैलेंस रखना जरूरी होता है। ऐसा न करने पर चार्ज लग सकता है। कुछ खातों में सालाना फीस या अन्य शर्तें भी होती हैं। ज्यादा खाते मतलब ज्यादा खर्च और ज्यादा जिम्मेदारी। वित्तीय सलाहकार मानते हैं कि हर व्यक्ति को बहुत सारे बैंक खातों की जरूरत नहीं होती। इतना ही सिस्टम रखें जिससे खर्च, बचत और निवेश साफ नजर आए। अगर खाते मदद कर रहे हैं तो ठीक है, लेकिन अगर उलझन बढ़ा रहे हैं तो उन्हें कम करना बेहतर है।





