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आज नरसिंह जयंती पर सुनें ये अधर्म पर धर्म की विजय की प्रेरणादायक कथा

नरसिंह जयंती पर पढ़ें भगवान नृसिंह के अवतार की कथा, जिसमें भक्त प्रह्लाद की भक्ति, हिरण्यकश्यप का अंत और धर्म की विजय का संदेश मिलता है.

नरसिंह जयंती हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन भक्तजन श्रद्धा और भक्ति भाव से भगवान नृसिंह की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखकर उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नृसिंह अवतार की कथा का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी होता है और इससे जीवन के सभी कष्टों का नाश होता है.

हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष की कथा

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, ऋषि कश्यप और दिति के दो पुत्र हुए—हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप. दोनों ही अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी थे. हिरण्याक्ष ने अपने अभिमान में पृथ्वी को समुद्र में डुबो दिया, तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया और पृथ्वी को पुनः स्थापित किया. भाई की मृत्यु से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से ऐसा वरदान प्राप्त किया जिससे वह लगभग अमर हो गया.

प्रह्लाद की अटूट भक्ति

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था. अपने पिता के विरोध के बावजूद उसने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी. हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया, लेकिन हर बार भगवान की कृपा से वह सुरक्षित बच गया. यह भक्ति और विश्वास की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है.

नरसिंह अवतार का प्राकट्य

जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है, तो प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि भगवान हर जगह हैं. क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने खंभे पर प्रहार किया, तभी उस खंभे से भगवान विष्णु नृसिंह रूप में प्रकट हुए—आधा मनुष्य और आधा सिंह.

अधर्म का अंत और धर्म की स्थापना

भगवान नरसिंह ने संध्या समय, घर की दहलीज पर, अपनी जंघा पर बैठाकर हिरण्यकश्यप का वध अपने नाखूनों से किया. इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मा के वरदान की सभी शर्तों का पालन करते हुए अधर्म का नाश किया. यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और सत्य की हमेशा विजय होती है और भगवान अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं.

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