भगवान श्रीराम और उनके भाइयों से जुड़ी कथाएं आज भी लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय बने हुए हैं. इन्हीं में एक सवाल यह भी है कि क्या चारों भाइयों का जन्म एक साथ हुआ था और आखिर लक्ष्मण का स्वभाव इतना तेज व गुस्सैल क्यों था. कथावाचक जगद्गुरु हरिप्रपन्नाचार्य महाराज ने इस बात को अपनी कथा के माध्यम से भक्तों को समझाया.
रामायण की गाथा में भगवान राम के शांत स्वभाव और लक्ष्मण के प्रखर तेज की चर्चा हमेशा होती है. अक्सर लोगों को लगता है कि चारों भाइयों का जन्म एक ही समय पर हुआ था, इसी विषय पर कथावाचक जगद्गुरु हरिप्रपन्नाचार्य महाराज ने अपनी कथा के दौरान एक विशेष रहस्य से पर्दा उठाया है. उन्होंने बताया कि चारों भाइयों के जन्म नक्षत्र अलग थे और क्या कारण था कि लक्ष्मण जी का स्वभाव इतना उग्र और पराक्रमी था.
अलग-अलग दिनों और नक्षत्रों में हुआ था जन्म
प्रसिद्ध कथावाचक जगद्गुरु हरिप्रपन्नाचार्य महाराज के अनुसार, भगवान राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म एक साथ नहीं हुआ था. सबसे पहले कर्क लग्न और मंगलवार के दिन भगवान राम का जन्म हुआ, जो उन्हें शांत, गंभीर और मर्यादित बनाता है. इसके बाद दूसरे दिन पुष्य नक्षत्र में मीन लग्न और बुधवार को भरत का जन्म हुआ, जिनका स्वभाव त्याग और समर्पण से भरा माना जाता है. वहीं तीसरे दिन अश्लेषा नक्षत्र में लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ था.
अश्लेषा नक्षत्र बना लक्ष्मण के स्वभाव की वजह
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अश्लेषा नक्षत्र का प्रभाव व्यक्ति को तेज, उग्र और तुंरत प्रतिक्रिया देने वाला बनाता है. यही कारण है कि लक्ष्मण का स्वभाव तीखा और गुस्सैल माना जाता है. हालांक उनका यह गुस्सा अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए ही प्रकट होता था.
परशुराम-लक्ष्मण संवाद में दिखा था लक्ष्मण का गुस्से वाला रूप
राधे श्याम रामायण प्रसिद्ध प्रसंग के अनुसार, जब भगवान राम ने शिव धनुष तोड़ा, तो भगवान परशुराम क्रोधित होकर सभा में पहुंचे. उन्होंने अपराधी को दंड देने की बात कही और अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया. जब परशुराम ने बार-बार अपने पराक्रम का बखान किया और कठोर वचन कहे, तब लक्ष्मण भी गुस्से में आ गए और बोले सच्चे योद्धा, सच्चे क्षत्रिय अपमान नहीं सह सकते हैं जिनको सुनने का ताव नहीं वो चुप कैसे रह सकते हैं यानी अन्याय के सामने चुप रहना कायरता की निशानी है.
इस दौरान लक्ष्मण ने चुप रहने के बजाय तीखे शब्दों में जवाब दिया. उन्होंने कहा कि बचपन में हमनें कई छोटे धनुष तोड़े, तब तो परशुराम को क्रोध नहीं आया. उन्होंने यह भी कहा कि पुराना धनुष श्रीराम के स्पर्श से ही टूट गया, इसमें उनका कोई दोष नहीं है.
अश्लेषा नक्षत्र में जन्म लेने वालों का व्यक्तित्व कैसे होता है?
ज्योतिष में 27 नक्षत्रों का विशेष महत्व बताया गया है और इन्हीं में से एक है अश्लेषा नक्षत्र. यह कर्क राशि में आता है और इसका स्वामी ग्रह बुध ग्रह होता है. इस नक्षत्र का प्रतीक नाग है, जो इसके स्वभाव को गहराई, चतुराई और रहस्य से जोड़ता है.जिन लोगों का जन्म इस नक्षत्र में होता है, उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में कुछ खास गुण देखने को मिलते हैं. ये जल्दी किसी पर भरोसा नहीं करते, जिससे कई बार इनके व्यक्तिगत संबंधों में तनाव आ सकता है. इनका क्रोध भी अचानक और तीव्र हो सकता है, हालांकि यह गुस्सा अक्सर परिस्थितियों और आत्मसम्मान से जुड़ा होता है, न कि बिना कारण.





