शास्त्रों के अनुसार, कुछ कार्यों के दौरान धर्मपत्नी को पति के बाएं तो कुछ कर्मों के दौरान दाएं बैठना चाहिए. ऐसे में आइए जानते हैं कि शुभ कार्यों के दौरन पत्नी को पति के दाएं या बाएं किस ओर बैठना चाहिए?
घर में पूजा-पाठ और शुभ कामों के दौरान पति और पत्नी दोनों की उपस्थिति बहुत जरूरी मानी जाती है. पूजा-पाठ या अन्य शुभ कामों के समय अक्सर लोगों के मन में ये भ्रम रहता है कि पति-पत्नी को किस तरह से बैठना चाहिए. उनके बैठने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति क्या होती है. शास्त्रों में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. पूजा-पाठ या मांगलिक कार्यों से जुड़े नियमों का पालन करना चाहिए.
अगर इन नियमों का पालन नहीं किया जाता है, तो पूजा-पाठ का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है. शास्त्रों के अनुसार, कुछ कार्यों के दौरान धर्मपत्नी को पति के बाएं तो कुछ कर्मों के दौरान दाएं बैठना चाहिए. ऐसे में आइए जानते हैं कि शुभ कार्यों के दौरान पत्नी को पति के दाएं या बाएं किस ओर बैठना चाहिए?
किन कामों में पत्नी को दाएं बैठना चाहिए?
सनातन धर्म में पत्नी को वामांगी (बाईं ओर रहने वाली) माना गया है, लेकिन लेकिन जब घर में किसी प्रकार धार्मिक या शुभ काम किए जाते हैं, तो उस दौरान पत्नी को अपने पति की दाईं ओर बैठना चाहिए. शास्त्रों में बताया गया है कि विवाहित पुरुष धार्मिक अनुष्ठान करे तो उसकी पत्नी का उसके दाईं ओर बैठना शुभ होता है.यज्ञ और कथा, हवन व पूजन में पत्नी को पति की दाईं ओर बैठना चाहिए.
सिंदूरदान की रस्म को छोड़कर विवाह की अन्य सभी पूजा विधियों में, श्राद्ध, तर्पण और पितरों से संबंधित अनुष्ठानों में, दान देते समय, व्रत का उद्यापन करते समय या चतुर्थी कर्म में, संतान के नामकरण संस्कार और कन्यादान के पवित्र संकल्प के समय और तीर्थ स्नान और किसी विशेष पर्व पर किए जाने वाले धार्मिक स्नान के वक्त पत्नी को अपने पति के दाईं ओर बैठना चाहिए.
पत्नी को कब बाईं ओर रहना चाहिए?
शास्त्रों के अनुसार, पत्नी के अपने पति के बाईं ओर तब बैठना चाहिए, जब वो सांसारिक या प्रेम संबंधी काम करें. इसके अलावा विवाह में सिंदूर दान के समय, ब्राह्मणों से आशीर्वाद ग्रहण करते समय, बड़ों के पैर धोते वक्त और सोने के दौरान पत्नी को हमेशा पति के बाईं ओर रहना चाहिए.





