‘देवदास’, ‘चंडीदास’, और ‘भाग्य चक्र’ जैसी फिल्मों की सफलता ने बी. एन. सरकार को सिनेमा की दुनिया का बादशाह बना दिया. उन्होंने केवल फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि तकनीक, कला और भारतीय संस्कृति के अद्भुत संगम का आंदोलन खड़ा किया.
नई दिल्ली\जिंदगी में कभी-कभी ऐसे पल आते हैं जो हमें तोड़कर रख देते हैं और सपनों को राख में बदल देते हैं. लेकिन वही राख कुछ लोगों के लिए उड़ने के नए पंख बन जाती है. बी. एन. सरकार की कहानी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक मिसाल है. वह सिर्फ एक फिल्म निर्माता नहीं थे, बल्कि सिनेमा के एक ऐसे साधक थे जिन्होंने भारतीय फिल्म जगत को नई दिशा दी. साल 1940 में एक आग ने उनका पूरा न्यू थिएटर्स स्टूडियो, रिकॉर्डिंग्स और वर्षों की मेहनत को जला दिया. ऐसे समय में अगर कोई आम इंसान होता तो शायद टूट जाता, लेकिन बी. एन. सरकार ने हार नहीं मानी. उन्होंने उस राख से फिर अपने सपनों को जिंदा किया, नए कलाकारों को मंच दिया, और भारतीय सिनेमा को फिर से ऊंचाइयों तक पहुंचाया
बी. एन. सरकार का पूरा नाम बीरेंद्रनाथ सरकार था. उनका जन्म 5 जुलाई 1901 को बिहार के भागलपुर में हुआ था. उनके पिता, सर निरेंद्रनाथ सरकार, बंगाल के पहले एडवोकेट जनरल थे, उनके परदादा पीरी चरण सरकार, ने अंग्रेजी भाषा की पहली भारतीय टेक्स्टबुक लिखी थी.
टिकट के लिए लंबी लाइन देख आया बिजनेस का आइडिया
बी. एन. सरकार ने कोलकाता के प्रसिद्ध हिंदू स्कूल से पढ़ाई करने के बाद लंदन यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. विदेश से लौटने के बाद उन्होंने कोलकाता में बतौर इंजीनियर करियर की शुरुआत की, लेकिन वह अपना बिजनेस करना चाहते थे. एक दिन उन्होंने सिनेमा हॉल के बाहर टिकट के लिए लंबी लाइन देखी तो उन्होंने इसे अपने व्यवसाय के तौर पर शुरू करने का फैसला लिया, जहां लोग बिना देखे ही टिकट खरीदने को तैयार थे. यहीं से उन्होंने फिल्म निर्माण में कदम रखा.





