एंग्जायटी के दौर में ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के ये 5 श्लोक युवाओं के लिए ‘लाइफ हैक्स’ हैं, जो कर्म, मानसिक संतुलन और स्वधर्म को अपनाकर तनावमुक्त जीवन जीने की कला सिखाते हैं.
आज कल के दौर में जहाँ ‘जैन जी’ पीढ़ी एंग्जायटी और ओवरथिंकिंग में रहती है, और थेरेपिस्ट के साथ ज्यादा समय बिताती है. दरसल उसे 5000 वर्ष पुरानी ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में अपने सारे उत्तर ढूँढने चाहिए . ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में कई ऐसे श्लोक है जो आज की युवा पीढ़ी के लिए लाइफ हैक की तरह साबित हो सकते है. उन में कुछ मुख्य यह रहे:-
1. ‘योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय। सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥’ (भगवद् गीता के अध्याय 2, श्लोक 48)
अक्सर हम कोई काम इसलिए करते हैं क्योंकि हमें उससे कुछ खास उम्मीद होती है. जब हम फल से बहुत ज्यादा जुड़ जाते हैं, तो डर और चिंता पैदा होती है. कृष्ण कहते हैं कि काम पर ध्यान लगाओ, उसके ‘परिणाम’ से होने वाले मोह पर नहीं. अगर हम सफलता और असफलता से परेशान नहीं होते है तो हम मानसिक रूप से मजबूत बन जाते है, और यहाँ पर योग का यह मतलब योगा से नहीं हैं, यहाँ मतलब यह है हर परिस्थिति में मन का संतुलन बनाए रखना. जो व्यक्ति सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में स्थिर रहता है, वही सच्चा योगी है.
2. ‘विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह:। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति॥’ (भगवद् गीता के अध्याय 2 के श्लोक 71)
इसमें श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे रहे है जो मनुष्य अपनी समस्त इच्छाओं और कामनाओं का त्याग कर, अहंकार और लालसा रहित होकर संसार में रहता है उसे ही परम शांति प्राप्त होती है. इसका मतलब यह नहीं है कि आप लक्ष्य न रखें, बल्कि यह है कि आप उन इच्छाओं के गुलाम न बनें जो आपको बेचैन करती हैं. जब आप बाहरी दुनिया की चकाचौंध और ‘सब कुछ पा लेने’ की होड़ छोड़ देते हैं, तो आपका मानसिक तनाव खत्म हो जाता है. शांति किसी वेकेशन में नहीं है, बल्कि मन के भीतर ‘अहंकार’ और ‘लालसा’ को खत्म करने में है.
3. ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥’ (भगवद् गीता के अध्याय 2, श्लोक 47)
यह श्लोक यह बताता है कि कर्म करना ही आपका धर्म है, तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं. आप क्या मेहनत कर रहे है वो आपके हाथ में है. लेकिन उसका क्या नतीजा क्या निकलेगा इस पर चिंता करने से वर्तमान के काम खराब होते है. जब फल की गारंटी नहीं मिलती, तो कई बार लोग सोचते हैं कि “फिर काम ही क्यों करना?” लेकिन फल की चिंता छोड़ना का यह मतलब नहीं कि आप काम करना छोड़ दे, कर्म करते रहना हमारा धर्म है.
4. ‘क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥’ ( भगवद् गीता के अध्याय 2, श्लोक 63)
गुस्से से भ्रम पैदा होता है, भ्रम में इंसान भूलने लगता है और उसे सही और गलत के बीच का फर्क दिखना बंद हो जाता है. व्यक्ति अपनी पुरानी सीख, संस्कार और मर्यादा भूल जाता है. उसे याद नहीं रहता कि वह किससे बात कर रहा है या इसके नतीजे क्या होंगे. गुस्से में इंसान अंधा हो जाता है. उसकी बुद्धि का विकास रोक जाता है, जब बुद्धि ही नहीं रही, तो इंसान ऐसे फैसले लेता है जो उसके करियर, रिश्तों और जीवन को तबाह कर देते हैं. यह श्लोक हमें ‘गुस्से में रिएक्ट न करने’ की सलाह देता है, जब आप बहुत ज्यादा इमोशनल या गुस्से में हों, तो कोई भी बड़ा फैसला न लें. क्योंकि उस वक्त आपकी ‘बुद्धि’ काम नहीं कर रही होती, सिर्फ ‘भ्रम’ हावी होता है.
5. ‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥’ (भगवद् गीता के अध्याय 3, श्लोक 35)
यहाँ ‘स्वधर्म’ का अर्थ है आपका स्वभाव और आपकी अपनी क्षमता . हर व्यक्ति एक खास गुण के साथ पैदा होता है. हम अक्सर दूसरों की सफलता देखकर उनकी नकल करने लगते हैं, उसे बेहतर है कि आप अपनी फील्ड में संघर्ष करें, क्योंकि वह आपका अपना रास्ता है. आप जब दूसरों की नकल करने लगते है तो आप अपनी शांति खो देते है. आप पूरी जिंदगी वह बनने की कोशिश करते हैं जो आप हैं ही नहीं. आप जो हैं, उसे स्वीकार करना ही सबसे बड़ी जीत है और आपके लिए वही अच्छा है वरना आपके जीवन में बेचैनी और तनाव उत्पन्न होने लगता है.





