वरुथिनी एकादशी व्रत वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में पड़ता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है. इस व्रत का अत्यधिक महत्व है. स्वयं श्रीकृष्ण ने बताया है कि यह व्रत दस हजार वर्षों की तपस्या और कन्यादान के समान पुण्य देता है. यह जाने-अनजाने में किए गए पापों को धोकर मोक्ष, धन-समृद्धि और सभी कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है.
साल भर में कुल 24 एकादशी के व्रत पड़ते हैं. अधिकमास में इन व्रतों की संख्या 26 हो जाती है. एकादशी का व्रत हर माह में कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन रखा जाता है. ये व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित किया गया है. हर एक एकादशी व्रत का अपना अलग महत्व और फल है, लेकिन वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी बहुत ही विशेष मानी जाती है.
पौराणिक कथाओं अनुसार, वरुथिनी एकादशी व्रत के महात्म्य के बारे में स्वयं श्रीकृष्ण ने बताया है. भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो लोग भगवान विष्णु के चरण कमलों में अपना शीश नवाकर इस एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें 10 हजार वर्षों की तपस्या करने के समान फल मिल जाता है. इतना ही नहीं यह एक व्रत कन्यादान करने के बराबर भी पुण्य देता है.
वरुथिनी एकादशी व्रत 2026 कब है?
- पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि 12 और 13 अप्रैल की मध्यरात्रि 01 बजकर 16 मिनट पर शुरू हो रही है.
- इस तिथि का समापन 13 और 14 अप्रैल की मध्यरात्रि 01 बजकर 08 मिनट पर हो जाएगा.
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इस तरह उदया तिथि के अनुसार, 13 अप्रैल 2026, सोमवार को वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा. व्रत का पारण 14 अप्रैल 2026 की सुबह 06 बजकर 54 मिनट से 08 बजकर 31 मिनट के बीच किया जा सकता है.
वरुथिनी एकादशी के व्रत का महत्व
वरुथिनी एकादशी का व्रत बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस व्रत को रखने से व्यक्ति के जाने अनजाने में किए सभी पाप धुल जाते हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त होता है. साथ ही धन-समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है. वरुथिनी एकादशी का व्रत सभी कष्टों से मुक्ति दिलाता है. ये व्रत रखने से हजारों साल की तपस्या करने और सूर्य ग्रहण के दौरान सोना दान करने के बराबर पुण्य मिलता है.





