हिंदू धर्म की परंपरा के अनुसार, हर साल वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को परशुराम जयंती मनाई जाती है. कहते हैं परशुराम भगवान के अंशावतार थे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु किसके अवतार थे और इस अवतार का पौराणिक महत्व क्या है. आइए जानते हैं परशुराम अवतार से जुड़ी कुछ खास बातें.
सनातन परंपरा के अनुसार, हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को परशुराम जयंती मनाई जाती है. चूंकि, इस दिन अक्षय तृतीया भी मनाई जाती है, इसलिए परशुराम जयंती का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान परशुराम अवतार लिए थे. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल परशुराम जयंती 19 अप्रैल को मनाई जाएगी. भगवान परशुराम को लेकर लोग यह बात तो जानते हैं कि उन्होंने क्षत्रियों का कई बार संहार किया था. लेकिन, इस बात से अधिकांश लोग अनजान हैं कि आखिर वे किस देवता के अवतार थे. ऐसे में आइए जानते हैं कि भगवान परशुराम किस देवता के अंशावतार थे और किस उद्देश्य के पूर्ति के लिए उनका यह अवतार हुआ.
किसके अवतार हैं भगवान परशुराम?
पुराणों के अनुसार, परशुराम भगवान विष्णु के अवतार हैं. प्रत्येक अवतार का एक निश्चित लक्ष्य होता है. परशुराम जी का अवतार अहंकारी और अधर्मी क्षत्रियों के दमन व ऋषि-मुनियों की रक्षा के लिए हुआ था. चूंकि परशुराम जी को अमरता का वरदान प्राप्त है, इसलिए मान्यता है कि वे इस धरती पर आज भी निवास करते हैं. कहते हैं कि जब विष्णु जी ने राम के रूप में नया अवतार लिया, तब परशुराम जी भी वहां उपस्थित थे.
कब हुआ था भगवान परशुराम का अवतार?
शास्त्रों के अनुसार, भगवान परशुराम का अवतार त्रेतायुग के शुरुआती चरण में हुआ था, जबकि श्री राम का जन्म उसी युग के अंतिम चरणों में हुआ. परशुराम जी अपनी अमरता के कारण त्रेता और द्वापर, दोनों युगों के साक्षी रहे हैं, जिससे श्री राम के साथ उनका मिलन संभव हुआ.
सीता स्वयंवर में भी मौजूद थे परशुराम
रामायण का सबसे चर्चित प्रसंग माता सीता के स्वयंवर है. जब श्री राम ने भगवान शिव का पिनाक धनुष तोड़ा, तो उसकी टंकार सुनकर परशुराम जी वहां पहुंचे. शुरुआत में वे क्रोधित थे, लेकिन जब श्री राम ने वैष्णव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी, तब परशुराम जी को आभास हो गया कि उनके सामने स्वयं साक्षात विष्णु के पूर्ण अवतार खड़े हैं. इसके बाद वे अपनी शक्ति श्री राम को सौंपकर तपस्या के लिए महेंद्र पर्वत चले गए.
महाभारत का प्रसंग भी है खास
कहा जाता है कि परशुराम जी की उपस्थिति सिर्फ रामायण काल तक ही सीमित नहीं रही. महाभारत (द्वापर युग) में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान है. उन्होंने ही पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और दानवीर कर्ण को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी थी. इसलिए कई ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि परशुराम श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों के समय में मौजूद रहे.





