रविवार, 25 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस पर्व पर हर्षण योग, वज्र योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के बनने का दावा किया जा रहा है।
शरद ऋतु की उजली चांदनी, चंद्रमा की शीतल आभा और मां लक्ष्मी की आराधना का पर्व शरद पूर्णिमा इस बार विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण चर्चा में है। रविवार, 25 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस पर्व पर हर्षण योग, वज्र योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के बनने का दावा किया जा रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इन संयोगों में मां लक्ष्मी की पूजा, दान-पुण्य और शुभ कार्यों का विशेष महत्व रहेगा।
कोजागरी पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
- शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागरण करते हुए उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर कृपा बरसाती हैं।
- ””को जागर्ति”” अर्थात कौन जाग रहा है, इसी भाव से इस पर्व का नाम कोजागरी पड़ा है।
- मान्यता के अनुसार, इस रात विधि-विधान से महालक्ष्मी की पूजा करने से सुख-समृद्धि और आर्थिक उन्नति का आशीर्वाद मिलता है।
- पंडित सौरभ दुबे के अनुसार, इस वर्ष बनने वाले शुभ योगों को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है।
- ज्योतिषीय गणनाओं में महालक्ष्मी योग का उल्लेख करते हुए इसे धन, समृद्धि और नए कार्यों के लिए अनुकूल बताया जा रहा है।
- हालांकि, किसी विशेष योग का 30 वर्ष बाद बनना और उससे जुड़े फल संबंधित पंचांग तथा ज्योतिषीय गणना के अनुसार ही देखे जाने चाहिए।
चांदनी में खीर रखने की परंपरा
शरद पूर्णिमा की सबसे लोकप्रिय परंपराओं में रात में खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा शामिल है। धार्मिक विश्वास है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृततुल्य गुण होते हैं और चांदनी में रखी खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। इसी मान्यता के चलते कई परिवार रात में खीर को खुले स्थान पर रखकर अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
ऐसे करें पूजा और आराधना
शरद पूर्णिमा पर प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जा सकती है। संध्या के समय चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य अर्पित करें। घर में दीपक जलाएं और अपनी परंपरा के अनुसार खीर, फल तथा अन्य नैवेद्य अर्पित करें। व्रत रखने वाले श्रद्धालु चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद अपनी व्रत-परंपरा के अनुसार पारण करें। रात्रि में भजन, मंत्र-जप और जागरण का भी विशेष महत्व है। शरद पूर्णिमा का संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह पर्व शरद ऋतु की निर्मलता, चंद्रमा की शीतलता और परिवार के साथ आस्था के क्षण साझा करने का अवसर भी है।





