रायपुर की ‘बढ़व संगवारी’ संस्था बुजुर्गों की संवेदनशील पहल का मजबूत उदाहरण बनकर उभरी है। वर्ष 2015 में शुरू हुई इस मुहिम ने अब तक 93 जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा और करियर का अवसर दिया है।
65 वर्ष से अधिक आयु के 205 सदस्य हर साल 6 हजार रुपए का योगदान करते हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई, रहने और अन्य जरूरतों का पूरा खर्च उठाया जाता है। संस्था का लक्ष्य अब 1000 बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है। खास बात यह है कि यहां से पढ़े बच्चे भी अब इस पहल से जुड़कर दूसरों की मदद कर रहे हैं।
संस्था की कोर कमेटी सदस्य और पूर्व सीएमएचओ रायपुर डॉ. मीरा बघेल बताती हैं कि फोकस ग्रामीण और सरकारी स्कूलों के उन बच्चों पर है, जो आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। संस्था के सदस्य पूरे छत्तीसगढ़ को अपना घर मानकर काम करते हैं।
चयन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए टीम स्कूलों में जाकर काउंसिलिंग करती है और वहीं आवेदन फॉर्म उपलब्ध कराए जाते हैं। बच्चे फॉर्म भरकर सीधे वाट्सएप के माध्यम से भेज सकते हैं, जिससे उन्हें शहर आने या अतिरिक्त खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती।
प्रारंभिक चयन के बाद ही बच्चों को आगे बुलाया जाता है। पिछले 11 वर्षों में इस पहल पर करीब 20 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। संस्था में किसी पद का प्रावधान नहीं है और 8 सदस्यीय कोर कमेटी ही सभी निर्णय लेती है।
जिंदगी बदली: संस्था की मदद से एमटेक, बार्क में वैज्ञानिक बने
इस पहल से कई बच्चों की जिंदगी बदली है। तिल्दा क्षेत्र के एक गरीब किसान के बेटे मनीष वर्मा, जिनके पिता ‘कला जत्था’ में काम करते थे, आर्थिक तंगी के कारण 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ने की स्थिति में थे। संस्था के सहयोग से उन्होंने आईआईटी मद्रास से एमटेक किया और अब भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) में वैज्ञानिक हैं।
ग्राम मौरा के किसान के बेटे पार्थ वर्मा को संस्था और नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. लाखेश मंडरिया के सहयोग से एसईसीएल में इंजीनियर बनने का मौका मिला। दुर्ग के मजदूर परिवार से आने वाले गणेश साहू आज एक सफल आर्टिस्ट हैं। इसके अलावा करीब 15 बच्चे विभिन्न प्राइवेट कंपनियों में इंजीनियर, एम्स में नर्स और टैली प्रोफेशनल के रूप में कार्यरत हैं।
संस्था का संचालन 205 सदस्य नियमित आर्थिक सहयोग के साथ जरूरतमंद बच्चों को संस्था से जोड़ने का काम भी करते हैं। इस पहल से सांसद विजय बघेल, मंत्री टंकराम वर्मा, विधायक मोतीलाल साहू, पूर्व सांसद छाया वर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी, कई प्रतिष्ठित चिकित्सक और विदेशों में रह रहे 17 इंजीनियर भी जुड़े हुए हैं।
डीडीनगर में संस्था 11 बेड का निशुल्क हॉस्टल भी संचालित कर रही है। इस मॉडल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि लाभान्वित छात्र ही आगे बढ़कर दूसरों का सहारा बनते हैं।



