कमजोर मॉनसून और महंगे तेल के खतरे के बीच भारत की इकोनॉमी पर महंगाई और मंदी का डबल दबाव बन सकता है, जिससे ग्रोथ और ग्रामीण मांग प्रभावित होने की आशंका है.
भारत की अर्थव्यवस्था इस समय दोहरे दबाव महंगाई और संभावित मंदी का सामना कर सकती है. एक तरफ कमजोर मॉनसून का अनुमान है, तो दूसरी ओर पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का खतरा बना हुआ है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों कारकों का असर खासतौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. हालांकि, मजबूत जलाशय स्तर और पर्याप्त अनाज भंडार कुछ हद तक राहत दे सकते हैं, लेकिन ग्रोथ पर दबाव बढ़ने की आशंका है.
भारत की अर्थव्यवस्था पर इस वित्त वर्ष में डबल शॉक यानी महंगाई और ग्रोथ स्लोडाउन का खतरा मंडरा रहा है. कमजोर मॉनसून के अनुमान और ईरान युद्ध के चलते बढ़ती ऊर्जा लागत ने आर्थिक जोखिमों को बढ़ा दिया है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2026 के लिए सामान्य से कम बारिश 92% of LPA का अनुमान जताया है. इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय पर पड़ सकता है. खासतौर पर खरीफ फसलों पर इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता है.
इकोनॉमिक ग्रोथ पर असर
HSBC की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजल भंडारी के अनुसार, यह स्थिति ट्विन शॉक जैसी है जहां मौसम और ऊर्जा दोनों से जुड़े जोखिम एक साथ सामने हैं. उनका मानना है कि इसका असर महंगाई से ज्यादा आर्थिक वृद्धि पर पड़ेगा. हालांकि, कुछ राहत के संकेत भी हैं. देश में इस समय जलाशयों का स्तर सामान्य से करीब 10% ज्यादा है और गेहूं-चावल का स्टॉक भी पर्याप्त है. इससे फूड इंफ्लेशन को कुछ हद तक काबू में रखा जा सकता है.
अगर कच्चे तेल की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो भारत की GDP ग्रोथ करीब 6.3% तक रह सकती है, लेकिन यदि यह 100 डॉलर या उससे ऊपर जाती है, तो ग्रोथ 5.8% तक गिर सकती है. ICRA की अर्थशास्त्री अदिति नायर का कहना है कि FY27 की पहली छमाही में ग्रामीण मांग मजबूत रह सकती है, क्योंकि रबी फसल अच्छी रही है. लेकिन दूसरी छमाही में यह रफ्तार धीमी पड़ सकती है.
प्रवासी मजदूरों की इनकम पर खतरा
एक्सपर्ट का यह भी मानना है कि पश्चिम एशिया संकट का असर प्रवासी मजदूरों की आय पर पड़ सकता है. अगर बड़े पैमाने पर रिवर्स माइग्रेशन होता है, तो ग्रामीण इलाकों में मजदूरी पर दबाव बढ़ेगा, जिससे मांग और कम हो सकती है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि एल-नीनो के साथ सूखे जैसी स्थिति बनती है, तो GDP में 20 से 65 बेसिस प्वाइंट तक की गिरावट हो सकती है. मार्च 2026 में ग्रामीण महंगाई 3.6% तक पहुंच गई, जो शहरी महंगाई से ज्यादा है. इसका मतलब है कि गांवों में कीमतों का दबाव तेजी से बढ़ रहा है.
इंडिया रेटिंग्स की मेघा अरोड़ा के अनुसार, अगर मॉनसून कमजोर रहता है, तो फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे किसानों की आय कम होगी. इसका असर ट्रैक्टर, टू-व्हीलर और FMCG सेक्टर की मांग पर भी पड़ेगा. कुल मिलाकर, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए यह साल चुनौतीपूर्ण हो सकता है. हालांकि, सरकार के पास हालात से निपटने का अनुभव और रणनीति मौजूद है. फिर भी, महंगाई और मंदी का यह डबल अटैक इकोनॉमी की रफ्तार को धीमा कर सकता है.



