“वैदेही” कार्यक्रम 25 अप्रैल से जानकी नवमी पर शुरू होगा, जहां सीता के आदर्श, कला और आधुनिक सोच के संगम से भारतीय संस्कृति और नारी शक्ति पर संवाद प्रस्तुत किया जाएगा.
भारतीय सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक सोच के बीच संतुलन स्थापित करने का एक अनूठा प्रयास “वैदेही” कार्यक्रम के रूप में सामने आया है. यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा है, जो यह समझने की कोशिश करती है कि आधुनिकता ने भारतीय मूल्यों और आदर्शों को किस प्रकार प्रभावित किया है. मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल और सीएसटीएस के सौजन्य से आयोजित इस कार्यक्रम में 14 राज्यों और 7 देशों की सहभागिता इसे वैश्विक पहचान प्रदान करती है. इस वर्ष इसका आयोजन 25 अप्रैल को जानकी नवमी के शुभ अवसर पर शुरू हो रहा है.
हिंदू परंपरा से जुड़ी “वैदेही” की अवधारणा
“वैदेही” शब्द का सीधा संबंध माता सीता से है, जिन्हें हिंदू धर्म में आदर्श नारी के रूप में पूजनीय माना जाता है. रामायण में वर्णित सीता का जीवन त्याग, धैर्य, साहस और मर्यादा का प्रतीक है. इसी कारण यह आयोजन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन जाता है. जानकी नवमी, जो माता सीता के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, उसी दिन इस कार्यक्रम की शुरुआत इसे धार्मिक भावनाओं से गहराई से जोड़ती है.
सीता: एक जीवंत विचार, केवल पौराणिक पात्र नहीं
कार्यक्रम की आयोजक डॉ. सविता झा के अनुसार, “वैदेही” में सीता को केवल एक पौराणिक पात्र के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि एक जीवंत विचार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उनका संघर्ष और सरोकार भौगोलिक सीमाओं से परे है. हर युग की नारी उनके जीवन से प्रेरणा ले सकती है. यही कारण है कि इस आयोजन में विभिन्न राज्यों और देशों के कलाकार भाग लेते हैं और अपने-अपने दृष्टिकोण से सीता को अभिव्यक्त करते हैं.
कला और अभिव्यक्ति का अनूठा संगम
“वैदेही” कार्यक्रम में मिथिला पेंटिंग के साथ-साथ अन्य भारतीय चित्रकला शैलियों में भी सीता के जीवन और भावनाओं को प्रस्तुत किया जाता है. यह प्रयोग कला के माध्यम से भारतीय संस्कृति को नए आयाम देता है. कलाकार चाहे महिला हों या पुरुष, सभी सीता के चरित्र से गहराई से जुड़ते हैं और अपनी संवेदनाओं को रचनात्मक रूप में व्यक्त करते हैं.
कोविड-19 के बाद सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का माध्यम
इस कार्यक्रम की अवधारणा कोविड-19 महामारी के बाद विकसित हुई, जब समाज भावनात्मक और मानसिक रूप से संघर्ष कर रहा था. ऐसे समय में “वैदेही” एक सांस्कृतिक मरहम बनकर उभरा, जिसने कला, संवाद और आत्ममंथन के जरिए लोगों को संबल प्रदान किया. यह एक प्रकार की ‘कैथार्सिस’ प्रक्रिया बन गया, जहां लोग अपने भीतर के भावों को समझ और व्यक्त कर सके.
बदलते समय में आदर्शों की प्रासंगिकता
आज की युवा पीढ़ी के लिए यह जरूरी नहीं कि वे सीता जैसे जीवन को अपनाएं, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि वे उनके अनुभवों और संघर्षों से जुड़ाव महसूस करें. “वैदेही” इसी संवाद को आगे बढ़ाता है, जहां आदर्श समय के साथ बदलते हुए भी अपनी मूल भावना को बनाए रखते हैं.
सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का उत्सव
“वैदेही” कार्यक्रम न केवल भारतीय संस्कृति को अभिव्यक्त करता है, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक स्वामित्व की भावना को भी मजबूत करता है. आयोजकों ने सभी कला प्रेमियों और आम नागरिकों से इसमें भाग लेने की अपील की है, ताकि यह आयोजन एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले सके.




