भारत में एक ऐसा गांव है, जहां अब तक कलयुग का प्रभाव नहीं है. इस गांव में लोग आज भी आधुनिक उपकरणों से दूर सादा जीवन जी रहे हैं. हम जिसकी बात कर रहे हैं, उसका नाम टटिया स्थान है. ये उत्तर प्रदेश के वृंदावन में स्थित है.
कलयुग के लगभग 5100 से अधिक वर्ष बीत चुके हैं. कलयुग 4,32,000 वर्षों का है. ये चारों युगों में अंतिम माना जाता है. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा जिस दिन देह त्याग किया गया वो द्वापरयुग का अंतिम दिन था. कलयुग के 5100 से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी भारत में एक ऐसा गांव है, जहां अब तक कलयुग का प्रभाव नहीं है.
इस गांव में लोग आज भी आधुनिक उपकरणों से दूर सादा जीवन जी रहे हैं. यहां लोगों के बीच आकर ऐसा लगता है कि जैसे हम कई सदियों पहले के युग में पहुंच गए हैं. हम जिसकी बात कर रहे हैं, उसका नाम टटिया स्थान है. ये उत्तर प्रदेश के वृंदावन में स्थित है. टटिया स्थान के लिए कहा जाता है कि यहां आज भी कलयुग नहीं आ पाया है.
टटिया स्थान की कहानी
इस जगह पर ललित किशोरी के सातवें अनुयायी हरिदास जी ध्यान किया करते थे. इसे हरिदास जी का ध्यान स्थल माना जाता है. स्वामी हरिदास को बांके बिहारी जी का परम भक्त कहा जाता है. उनको वृंदावन के पक्षियों, फूलों और पेड़ों से प्रेम और दिव्य संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई और फिर वो बड़े महापुरुष हुए. ये जगह बांस के डंडों से घिरी थी. इसे स्थानीय भाषा में टटिया कहा जाता है.
दिखती है प्राकृतिक खूबसूरती
यही कारण है कि इस जगह को टटिया स्थान के नाम से जाना गया. यहां के लोग ठाकुर जी और गौसेवा व संतों की सेवा करते हैं. यहां लोग प्राचीन काल जैसा बेहद सादा जीवन व्यतीत करते हैं. यहां बिजली नहीं है. लोग आज भी लैंप जलाकर उजाला करते हैं. हर काम हाथ से करते हैं. यहां किसी तरह की कोई आधुनिक मशीन आज भी नहीं है. यहां की प्राकृतिक खूबसूरती से भक्त जुड़ते हैं.
टटिया के स्थानीय लोगों का मानते हैं कि यहां आज भी ठाकुर जी का निवास है. यहां लोग अप्राकृतिक साधनों को चुनने की जगह ईश्वरीयता को चुनते हैं.





